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[ मंदिर सूचना ]

मंदिर क बारे मैं

उज्जैन का प्राचीन नाम उज्जयिनी है । उज्जयिनी भारत के मध्य में स्थित उसकी परम्परागत सांस्कृतिक राजधानी रही । यह चिरकाल तक भारत की राजनीतिक धुरी भी रही । इस नगरी कापौराणिक और धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है। भगवान् श्रीकृष्ण की यह शिक्षास्थली रही, तो ज्योतिर्लिंग महाकाल इसकी गरिमा बढ़ाते हैं। आकाश में तारक लिंग है, पाताल में हाटकेश्वर लिंग है और पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है। सांस्कृतिक राजधानी रही। यह चिरकाल तक भारत की राजनीतिक धुरी भी रही। इस नगरी कापौराणिक और धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है। भगवान् श्रीकृष्ण की यह शिक्षास्थली रही, तो ज्योतिर्लिंग महाकाल इसकी गरिमा बढ़ाते हैं। जहाँ महाकाल स्थित है वही पृथ्वी का नाभि स्थान है । बताया जाता है, वही धरा का केन्द्र है - उज्जयिनी में महाकाल की प्रतिष्ठा अनजाने काल से है । शिवपुराण अनुसार नन्द से आठ पीढ़ी पूर्व एक गोप बालक द्वारा महाकाल की प्रतिष्ठा हुई । महाकाल शिवलिंग के रुप में पूजे जाते हैं। महाकाल की निष्काल या निराकार रुप में पूजा होती है। महाकाल वन में अधिष्ठित होने से उज्जैन का ज्योतिर्लिंग भी महाकाल कहलाया अथवा महाकाल जिस वन में सुप्रतिष्ठ है, यह वन महाकाल के नाम से विख्यात हुआ। समय -समय पर उस मन्दिर का जीर्णोंद्धार होता रहा होगा। क्योंकि उस परिसर से ईसवीं पूर्व द्वितीय शताब्दी के भी अवशेष प्राप्त होते हैं। प्रारंभिक मन्दिर काष्ट-स्तंभों पर आधारित था। महाकालेश्वर का विश्व-विख्यात मन्दिर पुराण-प्रसिद्ध रुद्र सागर के पश्चिम में स्थित रहा है। महाशक्ति हरसिद्धि माता का मन्दिर इस सागर के पूर्व में स्थित रहा है, आज भी है। इस संदर्भ में महाकालेश्वर मन्दिर के परिसर में अवस्थित कोटि तीर्थ की महत्ता जान लेना उचित होगा। कोटि तीर्थ भारत के अनेक पवित्र प्राचीन स्थलों पर विद्यमान रहा है। सदियों से पुण्य-सलिला शिप्रा, पवित्र रुद्र सागर एवं पावन कोटि तीर्थ के जल से भूतभावन भगवान् महाकालेश्वर के विशाल ज्योतिर्लिंग का अभिषेक होता रहा है। पौराणिक मान्यता है कि अवन्तिका में महाकाल रूप में विचरण करते समय यह तीर्थ भगवान् की कोटि ;पाँव के अंगूठेद्ध से प्रकट हुआ था। उज्जयिनी का महाकालेश्वर मन्दिर सर्वप्रथम कब निर्मित हुआ था, यह कहना कठिन है। निश्चित ही यह धर्मस्थल प्रागैतिहासिक देन हैं। पुराणों में संदर्भ आये हैं कि इसकी स्थापना प्रजापिता ब्रह्माजी के द्वारा हुई थी। हमें संदर्भ प्राप्त होते हैं कि ईपू छठी सदी में उज्जैन के एक वीर शासक चण्डप्रद्योत ने महाकालेश्वर परिसर की व्यवस्था के लिये अपने पुत्र कुमारसेन को नियुक्त किया था। उज्जयिनी के चौथी - तीसरीसदी ईपू क़े कतिपय आहत सिक्कों पर महाकाल की प्रतिमा का अंकन हुआ है। अनेक प्राचीन काव्य-ग्रंथों में महाकालेश्वर मन्दिर का उल्लेख आया है। गुप्त काल के उपरांत अनेक राजवंशों ने उज्जयिनी की धरती का स्पर्श किया। इन राजनीतिक शक्तियों में उत्तर गुप्त, कलचुरि, पुष्यभूति, गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। सबने भगवान् महाकाल के सम्मुख अपना शीश झुकाया और यहाँ प्रभूत दान-दक्षिणा प्रदान की। पुराण साक्षी है कि इस काल में अवन्तिका नगर में अनेक देवी-देवताओं ेके मन्दिर, तीर्थस्थल, कुण्ड, वापी, उद्यान आदि निर्मित हुए। चौरासी महादेवों के मन्दिर सहित यहाँ शिव के ही असंख्य मन्दिर रहे।


मंदिर का इतिहास

जहाँ उज्जैन का चप्पा-चप्पा देव - मन्दिरों एवं उनकी प्रतिमाओं से युक्त रहा था, तो क्षेत्राधिपति महाकालेश्वर के मन्दिर और उससे जुड़े धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिवेश के उन्नयन की ओर विशेष ध्यान दिया गया। इस काल में रचित अनेक काव्य-ग्रंथों में महाकालेश्वर मन्दिर का बड़ा रोचक व गरिमामय उल्लेख आया है। इनमें बाणभट्ट के हर्षचरित व कादम्बरी, श्री हर्ष का नैपधीयचरित, पुगुप्त का नवसाहसांकचरित मुख्य हैं।परमार काल में निर्मित महाकालेश्वर का यह मन्दिर शताब्दियों तक निर्मित होता रहा था। परमारों की मन्दिर वास्तुकला भूमिज शैली की होती थी। इस काल के मन्दिर के जो भी अवशेष मन्दिर परिसर एवं निकट क्षेत्रों में उपलब्ध हैं, उनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह मन्दिर निश्चित ही भूमिज शैली में निर्मित था। इस शैली में निर्मित मन्दिर त्रिरथ या पंचरथ प्रकार के होते थे। शिखर कोणों से ऊरुशृंग आमलक तक पहुँचते थे। मुख्य भाग पर चारों ओर हारावली होती थी। यह शिखर शुकनासा एवं चैत्य युक्त होते थे जिनमें अत्याकर्षक प्रतिमाएँ खचित रहती थीं। क्षैतिज आधार पर प्रवेश द्वार, अर्ध मण्डप, मण्डप, अंतराल, गर्भगृह एवं प्रदक्षिणा-पथ होते थे। ये अवयव अलंकृत एवं मजबूत स्तम्भों पर अवस्थित रहते थे। विभिन्न देवी -देवताओं, नवगृह, अप्सराओं, नर्तकियों, अनुचरों, कीचकों आदि की प्रतिमाएँ सारे परिदृश्य को आकर्षक बना देती थीं। इस मन्दिर का मूर्ति शिल्प विविधापूर्ण था। शिव की नटराज, कल्याणसुन्दर, रावणनुग्रह, उमा-महेश्वर, त्रिपुरान्तक, अर्धनारीश्वर, गजान्तक, सदाशिव, अंधकासुर वध, लकुलीश आदि प्रतिमाओं के साथ-साथ गणेश, पार्वती, ब्रह्मा, विष्णु, नवग्रह, सूर्य, सप्त-मातृकाओं की मूर्तियाँ यहाँ खचित की गइ थीं। उज्जैन में मराठा राज्य अठारहवीं सदी के चौथे दशक में स्थापित हो गया था। पेशवा बाजीराव प्रथम ने उज्जैन का प्रशासन अपने विश्वस्त सरदार राणोजी शिन्दे को सौंपा था। राणोजी के दीवान थे सुखटनकर रामचन्द्र बाबा शेणवी। वे अपार सम्पत्ति के स्वामी तो थे किन्तु नि:संतान थे। कई पंडितों एवं हितचिन्तकों के सुझाव पर उन्होंने अपनी सम्पत्ति को धार्मिक कार्यों में लगाने का संकल्प लिया। इसी सिलसिले में उन्होंने उज्जैन में महाकाल मन्दिर का पुनर्निर्माण अठारहवीं सदी के चौथे-पाँचवें दशक में करवाया।


[ मंदिर गतिविधि ]


दिनचर्या

समय गतिविधि
04:00 AM-05:00 AM भस्मारती
07:00 AM-07:30 AM प्रातःकाल पूजा
10:00 AM-10:30 PM मध्या पूजा
05:00 PM-05:30 PM सांयकाल पूजा
07:00 PM-07:30 PM सांयकाल आरती
10:30 PM-11:00 PM शयन

भजन

भजन संग्रह
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[ आयोजन ]


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